निकली हूँ
By Kaynat Ansari
अगले पेंचाले सब भुला के निकली हूँ,
मैं सारी कश्तियाँ जला के निकली हूँ।
मान लिया — हर ख़्वाब का पूरा होना ज़रूरी नहीं,
मैं हार के डर से जीत के निकली हूँ।
अब कोई आए दिल-ए-ज़ार या नया, क्या फ़र्क़ पड़ता है,
दिल-ए-वीरान में जो मिला, उसी का शुक्र करके निकली हूँ।
दयार-ए-गुज़िश्ता में भी तन्हा थी,
और दयार-ए-आइंदा में भी अकेली हूँ।
बातिनी इज़्तिराब से जूझती हूँ हर शब-ओ-रोज़,
शिक्वों के समंदर में डूबती हूँ।
रात की सियाही में ख़ुद से सवाल करती हूँ,
फिर सारे जवाब भुला के निकली हूँ।
नए साए, पुराने ज़ख़्म संभाल के रखती हूँ,
वक़्त तो गुज़र गया, ज़ेहन उस पल में ठहर गया।
दश्त-ए-तन्हाई में राह बना के निकली हूँ।
ये मेरी दास्तान है, ये सबकी दास्तान है,
ज़िंदगी से हार कर जो लोग जीते हैं — ये उनकी दास्तान है।
हम रौशनी से हारे, अँधेरों से निकले हैं…
क़फ़स चाहे पाबंदी का हो, या एहतिराम का एहसास,
आँखों में थाम के, लबों पे अल्फ़ाज़ रुक गए।
लोगों की ज़िंदगी का अधूरा बाब बन कर,
मैं अपनी किताब पूरी करके निकली हूँ…
— कायनात अंसारी