शीर्षक - दास्तां चांद की
By sitesh anand
शीर्षक - दास्तां चांद की
ऐ चांद, मै तुझे क्यों देखता हूं
ये प्रश्न तुम्हीं से पूछता हूं?
क्या तुम सुन्दर हो इसलिए?
क्या तुम शीतल हो इसलिए?
क्या तुम चमकीले हो इसलिए?
आखिर बता ही दो किसलिए?
एकटकटकी नजरों से वो,
हमें देखता रहा !
फिर कहा ,
तुम सुन्दर हो इसलिए।
तुम अच्छे हो इसलिए।
तुम गुणवत्तापूर्ण हो इसलिए।
है कौन जो यहां, किसी को अच्छा कहे।
है कोन यहा ,किसी की तारीफ करें ।
लोगों को चांद में दाग नजर आता है।
अपना खट्टा दही भी, मीठा नज रआता है ।
मैं एक ही बात दोहरता हूं!
ऐ अजनबी मत कर मेरी तारीफ़ ।
तूझे ही लोग ग़लत समझेंगे।
चांद में दाग लग चुका है
अब कहां पाक समझेंगे!
-सीतेश आनन्द