शीर्षक - भूलने लगे हो
By sitesh anand
शीर्षक - भूलने लगे हो
उदासी चेहरे पर छानी लगी
शायद मैं भूलने लगा हूं तुम्हें
या भूलने लगे हो तुम हमें
उतार चढ़ाव सी आने लगी है
खुशियाँ भी अब गुमसुम सी हैं
हर बात में कुछ कमी सी है
तन्हाई अब साथी लगती है
हर शाम अधूरी सी लगती है
नज़रों में धुंधलापन सा है
हर सपना अब बेजान सा है
दिल की दीवारें चुप हैं सारी
खामोशी बन गई है हमारी सवारी
लब खामोश, पर दिल चीखता है
तेरी यादों में हर पल भीगता है
तेरे बिना ये मौसम भी सुने हैं
फूल खिले मगर रंग फीके हैं
वक़्त ठहरा है इन साँसों में
तेरे नाम की गूँज है हर बातों में
जो अधूरी थी वो बात रह गई
जो कसक थी, अब आदत बन गई
अब ना शिकायत, ना कोई गिला है
बस तेरा नाम लबों पर सिलसिला है
उदासी चेहरे पर छानी लगी
शायद मैं भूलने लगा हूं तुम्हें
या भूलने लगे हो तुम हमें
-सीतेश आनन्द