Jaykishan Singh
Author
Poet & Short Story Writer
Published writing
रात अकेले ही खड़ी है
थोड़ी गुमशुम है थोड़ी हैरां है शायद मिली नहीं है चन्दा से, धुन में अपनी हुंकार भरी है रात अकेले ही खड़ी है । होश नहीं है चन्दा को वो खेल रहा घटाओं से, कभी छिप जाता है घंटों तक कभी बतियाता हवाओं से । भौं चढ़ा ली रात ने अपनी बात ये चन्दा तक पहुंची है, अब फूल सफेद चन्दा है लाया देख उसे दिल वार पड़ी है रात अकेले ही खड़ी है । बरसाते अधजल बादल हैं गुर्राते हर पल बादल हैं, गरजते हैं इतराने को जल कितना ये दिखा…