Kaynat Ansari

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निकली हूँ

अगले पेंचाले सब भुला के निकली हूँ, मैं सारी कश्तियाँ जला के निकली हूँ। मान लिया — हर ख़्वाब का पूरा होना ज़रूरी नहीं, मैं हार के डर से जीत के निकली हूँ। अब कोई आए दिल-ए-ज़ार या नया, क्या फ़र्क़ पड़ता है, दिल-ए-वीरान में जो मिला, उसी का शुक्र करके निकली हूँ। दयार-ए-गुज़िश्ता में भी तन्हा थी, और दयार-ए-आइंदा में भी अकेली हूँ। बातिनी इज़्तिराब से जूझती हूँ हर शब-ओ-रोज़, शिक्वों के समंदर में डूबती हू…

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