Himanshu Sahu

Writer · Kanpur, Uttar Pradesh · India

A writer at heart, but an electronics engineer by profession.

A writing journey

Hi, I'm Himanshu Sahu, an Electronics Engineer. I wrote my first Hindi poem in the 10th grade; I was 14 years old at the time. I continued writing after that—it is truly enjoyable. Although I am an electronics engineer by profession and currently work at the Indian Space Research Organisation (ISRO), I still keep writing Hindi stories and poems.

Published writing

साथ मिले उन लोगों का

वो मेरा साथ निभाए चलें, मैं उनका साथ निभाए चलूँ; पग-पग में साथ रहे जिनका, साथ मिले उन लोगों का।

यात्री प्रतीक्षालय

दिलों में अजीब सी कशमकश है कोई कुछ नहीं बोल रहा। लड़की बार-बार देख रही है लड़के को, क्योंकि वह लड़के की ओर मुहँ करके बैठी है; हालांकि कभी-कभी सीधे भी बैठ जाती है, लेकिन लड़के ने एक-बार भी नहीं देखा। शायद लड़का बोलना चाहता है। लेकिन वह हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। मुझे लगता है बात तो की जा सकती थी लेकिन बातें क्यों नहीं हुयी, ये सोचनीय है। कई मौके थे लेकिन शायद वो काफ़ी नहीं थे। उस लड़के ने बताया कि कई बार मेरे ज़हन में ये ख़्याल आया कि बात शुरू करें, कोई भी विषय लेकर; जैसे- कौन-सी ट्रेन से जा रही हो या फिर कितने बजे ट्रेन है या फिर कहाँ जा रही हो, वगैरह-वगैरह।

ज़मी

क्यों ज़मी ने पुकारा ,तुम्हें आज फिर से, नहीं जा रहे क्यों कदर करने इसकी, इस ज़मी के बिना तेरा कोई नहीं, ऐ मुसाफिर, अगर तू गया छोड़ के।

मन रे

मन के मन की करूँ हमेशा, मन ही तो करवावे, मन ही तो करवावे, मन ही तो करवावे, मैं तो मूक, खड़ा, देखता, कैसे मन हमको नचवावे, मन रे, तू काहे हमे भरमावे।

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