samridhi mani tripathi
Poet · Uttar Pradesh · India
I write poems anxiety se light feel karne kai liye
I write poems anxiety se light feel karne kai liye
Maine jab phele poem likhi thi jo sayad maine natak kiya tha likhne ka ,kyuki likhne kai baad bhi mujhe yaaken nahi ho raha tha ki ye maine likha hai
Mai apne feelings ko le kar confident feel karti thi
Per apni writing per nahi kiya
Per fir bhi writing per garv hota tha ki ye maine likha hai
Kyuki mai sab sach likhti thi aur hu
Published writing
एक कविता तेरी एक कविता मेरी
एक कविता तेरी, एक कविता मेरी
चल, एक कविता तेरी,
एक कविता मेरी।
तेरी कविता में
मेरा वजूद क्या है—
नहीं पता।
मेरी कविता में
मेरा वजूद क्या है—
नहीं पता।
फिर भी हम साथ हैं।
पर शायद हमारा साथ
कविताओं की वजह से नहीं।
क्योंकि
तुझे मैं नहीं चाहिए
तेरी कविता में।
और मेरी कविता तो
तेरे ऊपर है—
पूरी की पूरी
तेरी कहानी है।
यही फ़र्क़ है
मेरे और तेरे में,
तेरी कविता और मेरी कविता में।
तुझे मैं चाहिए—
ताकि तेरी कविता में
मैं न रहूँ।
ताकि तू अपना बचा हुआ वक़्त
मेरे सहारे गुज़ार सके।
बस एक बचा हुआ वक़्त—
जिसे तू
ख़ुद के साथ
सही से नहीं बिता पाती।
और मेरी पूरी कहानी ही
वो बचा हुआ वक़्त है तेरा।
जिसमें मैं जीती हूँ,
तेरा इंतज़ार करती हूँ,
और शायद
तुझे अपनी कविता बनाती रहती हूँ।
बहुत फ़र्क़ है
तेरी और मेरी कविता में।
तो—
एक कविता तेरी,
जिसमें मैं नहीं हूँ।
और एक कविता मेरी,
जिसमें
तू ही तू है।
"तुम ही सत्य हो, शिव हो, सुंदर हो "
तुम ही सत्य हो, शिव हो, सुंदर हो"
तुम्हें सभी शिव कहते हैं,
तुम्हें सभी सत्य कहते हैं,
तुम्हें सभी सुंदर कहते हैं —
और कहें भी क्यों न?
जटाओं में जंगलों का वास,
फिर भी मुख पर शांति का प्रकाश।
विष धारण कर,
नीलकंठ बन जाते हो,
और विष से लिपटे नाग को
गले लगाकर,
मोह और भय—दोनों पर विजय पाते हो।
ललाट पर शोभित चंद्रमा,
मानो प्रेम की शीतलता में डूबा
शांति और सुकून का प्रतीक।
तुम्हारी जटाओं से बहती गंगा—
पावन, निर्मल, सबको छू लेने वाली।
कैसे न लगो तुम सुंदर?
न किसी से द्वेष, न किसी से लोभ,
सब पर समान प्रेम,
एक धतूरे का पुष्प भी
तुम्हारे चरणों में चढ़कर
पवित्र हो जाता है।
तुम सत्य हो,
जीवन के हर रूप में।
तुम्हारी हर लीला, हर अंश,
जीव को मोह में बाँध लेता है।
तुम्हारा हर रूप भोला है,
जिसमें कोई छल नहीं।
तुम पिता हो, तुम परमेश्वर हो,
तुम शांति हो, तुम प्रेम हो।
तुम आसक्ति से परे हो,
फिर भी सबमें समाए हुए हो।
तुम दिखाते हो एक अनोखा जीवन—
जहाँ गौरी का प्रेम है,
तुम्हारा वियोग भी है,
तुम्हारा क्रोध है,
और उस क्रोध के बाद की
गहन चुप्पी और शांति भी।
कैसे न हो तुम सुंदर?
तुमसे जुड़ा हर जीवन सुंदर है,
तुमसे जुड़ा गौरी का प्रेम भी पावन है।
तुम ही सत्य हो,
तुम ही शिव हो,
तुम ही सुंदर हो।