Imtiyaz Akhtar, Algeria's National Honour
October 2026
मन का रावण
त्रेता युग का दशानन, दस शीशों का धारी था,
अहंकारी तो था, मगर दुराचारी नहीं, विद्वान बड़ा भारी था।
अहंकार-वश मारा गया, यही उसकी लाचारी थी,
रणभूमि में उसका अंत हुआ, फिर भी कथा उसकी जारी थी।
कलियुग में सौ-सौ शीशों वाला रावण मन में बैठा है,
द्वेष, ईर्ष्या और कपट का विष नस-नस में ऐंठा है।
लोभ-लालच, व्यभिचार, दुराचार का साम्राज्य सजाता है,
कट्टरता और अहंकार का विष हर हृदय में भर जाता है।
इन शीशों का वध हो जाए, तो हर नारी निर्भय हो,
हर जीव सुरक्षित साँस भरे, जग करुणामय और अभय हो।
पर रावण बाहर नहीं, तुम्हारे अंतर्मन में पलता है,
अधर्म का बीज तुम्हीं में है, जो प्रतिपल पनपता है।
मन का रावण संहारकर, मर्यादा-पथ अपनाना होगा।
काम-क्रोध का त्याग कर, धर्म-दीप जलाना होगा।
शस्त्र नहीं, सद्बुद्धि से अब अधर्म का संहार करना होगा,
बहुमुखी रावण को हरने अब स्वयं तुम्हें श्रीराम बनना होगा।
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