विरासतें संजोती बेटियाँ
by Pavitra Singh
एक स्त्री रोग विशेषज्ञ के रूप में ग्रामीण क्षेत्र में कार्य करने का अनुभव मेरे लिए जीवन का सर्वाधिक विशेष और विविधताओं से भरा अनुभव है जब महिलाओं के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी हम लेते हैं तो ना केवल शारीरिक बल्कि उनके मानसिक स्वास्थ्य की जिम्मेदारी में भी हमारा योगदान होता है ।माहवारी के दर्द से लेबर पेन की पीड़ा तक और बांझपन के कलंक से मेनोपॉज के अवसाद तक महिलायें सहती हैं और सब सहते हुए ज़िंदा रखती हैं अपने अस्तित्व को ,तमाम कर्तव्य पूरा करते हुए । नारी से नारी तक अनेक रूप देखे उनकी अनेक भावनाओं की संवेदना को महसूस किया और इसी क्रम में कई बार पुत्र ना होने पर या इंफर्टिलिटी से जूझती हुई महिला के परिवार की असंवेदनशीलता को भी महिलाओं में ही महसूस भी किया वाक़ई नारी तेरे रूप अनेक ! वंश वृद्धि के लिए पुत्र होना जरूरी है इस ज़रूरत को जितनी शिद्दत से मैंने अपने कार्य में महसूस किया शायद में सामान्य तौर पर नहीं कर पाती । पुत्र होने के हर्ष और पुत्रियाँ होते रहने के बाद निराश लोगों के आँसुओं से भरे अनेक लम्हों की साक्षी रही हूँ मैं ,और बांझपन से मुरझाये चेहरों को गुड न्यूज़ के बाद खिलते हुए देखा है और उनकी ख़ुशी मे दी गई तमाम दुआओं को आत्मसात करने का आनंद भी लिया है। दूसरी और ये दंश झेलते हुए जोड़े की पीड़ा और अवसाद को महिलाओं में पुरुष से ज़्यादा महसूस किया है चाहे कारण पुरुष ही क्यों ना हों । बेटो से वंश बढ़ते हैं लेकिन इस वंश को बढ़ाने वाली का योगदान हम दरकिनार नहीं कर सकते कुछ अच्छे कुछ कटु लगने वाले तथ्यों को अपनी कलम से शब्दों का रूप देने का प्रयत्न किया है ..
बेटे होते हैं विरासतों के वाहक
स्थापित कुल के स्थापित संरक्षक ।
बेटियाँ भी संजोती हैं विरासतें ,
वो सहेजती हैं अनंत परम्पराएँ ।
माँ का वात्सल्य ,पिता की उदारता ,
जीवन के हर सोपान का संघर्ष ,
माँ की कर्मठता पिता का आदर्श ।
बचपन से दी गई तमाम नसीहतें ,
कुल से कुल को जाने वाली वसीयतें ।
उन्मुक्त बचपन से यौवन का सफ़र ,
यौवन से गुजरा प्रौढ़ होने तक का पहर ।
और इस सफ़र के अनगिनत पड़ाव ,
हर पीड़ा के बाद एक नया प्रादुर्भाव ।
मासिकस्राव से गर्भ की वेदना तक ,
युवावस्था से माँ बनने की संवेदना तक ।
वंश बेल देकर सौंपती है विरासत ,
कभी पुत्र के रूप में अति उल्लास ,
कभी पुत्र ना होने पर उपजा त्रास ।
सौंप देती है फिर ये वेदना भी ,
बेटियों को अनचाही विरासत में
पुत्र ना देने के अवसाद को ,
बांझपन के अनचाहे दोष को ,
सहती हैं अनेकों आक्षेप भी,
दबाए हुए तमाम आक्रोश को ।
कभी ढोती हैं कोल्हू के बेल सा भार ,
कभी दर्जा बदलते ही ले लेती हैं प्रतिकार ।
क्रूर मानसिकता भी विरासत में संजोती हैं ,
जिसकी कभी ख़ुद भुक्तभोगी होती हैं ।
कभी शिक्षा के विकास से विकसित
कभी शिक्षित होकर भी कुंठित ,
संग्रहित करती हैं आनुवंशिकता को ,
परंपराओं का सतत निर्वाह भी ।
अपूर्णता में पूर्णता को खोजकर ,
अप्राप्त से प्राप्त की चाह भी ।
पाणिग्रहण से परलोक गमन तक ,
सौंप जाती हैं अनेकों संवेदनाएं ,
कुछ व्यक्त कुछ अव्यक्त वेदनायें ,
कुछ कहीं कुछ अनकही हसरतें ,
हाँ बेटियां भी संजोती हैं विरासतें 💐🙏
डॉ पवित्रा सिंह
Published on the Writory Wall.