आजादी
by Udit Kumar
जब आज़ादी का शोर हुआ, तब उठी एक भीषण ज्वाला,
युवाओं की धड़कन में, मिट्टी के कण-कण में।
ना भय था मृत्यु का, ना लालसा रही सुख-सुविधा की,
बस आज़ादी ही आवाज़ बनी, भारतवर्ष की मिट्टी की।
कई वीर शहीद हुए, इस पावन धरती की आज़ादी को,
गुलामी की उस अँधेरी रात में, आज़ादी के दीये जले।
हर गुमनाम शहादत से, देश के गलियारों में आज़ादी के फूल खिले।
नमन है उन शहीदों को, जो आग हुए इस आँधी में,
नमन उन वीरों को, जो याद बनें आज़ादी में।
More by Udit Kumar
Udit Kumar's full record: their portfolio on Writory.
Published on the Writory Wall, which is free to post to and free to read · enter the November contest