रीढ़
by Kanhaiya Kumar, India. Third place in the Writory International Poetry Contest, May 2026, scored 92 out of 100.
रीढ़ शाम 6:21 दरवाज़ा खुलता है— धीरे से। कंधे पहले अंदर आते हैं, फिर आदमी। कमीज़ की सिलवटों में दिन अटका हुआ है। वो कुर्सी पर नहीं बैठता, पहले दीवार छूता है— जैसे घर को हाज़िरी दे रहा हो। माँ पूछती है— “खाना अभी?” वो सिर हिला देता है। पानी का गिलास आधा ही पीता है, बाकी मेज़ पर छोड़ देता है— जैसे थोड़ी थकान कल के लिए बचा रहा हो। मैं किताब खोलकर बैठा हूँ, पन्ने पलटता हूँ तेज़-तेज़, ताकि उसे लगे— मैं आगे बढ़ रहा हूँ। वो कुछ नहीं कहता। बस मेरी पीठ सीधी देखता है। रात 11:08 सब सो चुके हैं। वो उठकर दरवाज़े की कुंडी देखता है, चूल्हा, स्विच, खिड़की— एक-एक कर। फिर अपनी पीठ पकड़कर थोड़ा झुकता है। उसी झुकाव पर टिका है घर।
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