रिवाज़ ( औरत की छाती)
by Jheel Gautam, India. Third place in the Writory International Poetry Contest, November 2025, scored 92 out of 100.
रिवाज़ (औरत की छाती) बचपन से ही उस घर का एक रिवाज़ रहा — जहाँ पाली गईं बेटियाँ, जहाँ बाग़ों में लगाए गए गुलाब के फूल, जहाँ केशों को कटवाना समझा गया खूबसूरती पर एक दाग, और जहाँ देह को दिखाना माना गया एक अभिशाप। एक ऐसा रिवाज़ जो सदियों से चला आया, जिसमें बंध गईं हर घर की स्त्रियाँ — माँ, नानी, दादी, चाची, ताई — जिन्हें रखा गया सीप की भाँति, और कहा गया — “देह ही तुम्हारा मोती है, और लाखों मछुवारे इस पर दाँव लगाए बैठे हैं।” बचपन से ही औरत की छाती पर उठते रहे सवाल, स्तनों को छुपाने की सीख सिखाई गई। कभी माँ ने सुनाई वह कहानी, जो रिवाज़ की भीड़ में नानी से चली आई थी — कहा, “आदमी की छाती शेर की दहाड़ है, और उसका चौड़ा होना गर्व और सम्मान है।” पर यह नहीं बताया — कि “स्त्री की छाती ने ही बनाए हैं वो शेर।” जिसे छुपाने के लिए हर एक कोशिश रची गई — बाज़ार में रिवाज़ चलाने के लिए, कहानियाँ गढ़ी गईं, और पुरुषों को दिया गया जानवर का स्वरूप। लेकिन जब मैंने देखा स्त्रियों को अपनी उम्र के अंतिम पहर में, तो यह रिवाज़ कुछ टूटता-सा नज़र आया। नानी, दादी ने स्तनों को सुरक्षित रखने के लिए अब कोई नई कहानी नहीं बनाई, और न ही अब था छाती पर लगने वाला कोई रिवाज़। था तो बस — स्त्रीत्व की महक का आख़िरी कण, जो इस रिवाज़ को तोड़ चुका था।
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