चौखट
by Kanhaiya Kumar, India. First place in the Writory International Poetry Contest, June 2026, scored 93 out of 100.
चौखट शाम 6:17 दरवाज़ा खुलता है। पिता लौटते हैं। कंधों पर दिन भर की थकान, चेहरे पर घर पहुँच जाने की शांति। चौखट हर रोज़ उनके कदमों की धूल सबसे पहले अपने पास रख लेती है। माँ ने अपनी आधी उम्र यहीं खड़े-खड़े काटी है। गली के उस मोड़ को देखते हुए, जहाँ से अपने लौटते दिखाई देते हैं। इसी चौखट को पकड़कर मैंने पहला कदम बाहर रखा था। स्कूल की ओर। पीछे मुड़कर देखा, तो माँ अब भी यहीं खड़ी थीं। बरसों बाद बहन भी यहीं ठिठकी थी। एक पैर घर में, एक दुनिया में। आँखों में पूरा बचपन था। फिर वह चली गई। और चौखट पर कुछ चूड़ियों की खनक रह गई। दादा की लाठी भी घर में आने से पहले यहीं कुछ पल रुकती थी। जैसे चौखट से पूछती हो— "सब कुशल है न?" फिर एक दिन चार कंधे निकले। धीरे-धीरे। घर से बाहर। उस दिन सब रो रहे थे। माँ, मैं, दीवारें तक। पर चौखट चुप थी। बिल्कुल चुप। शायद इसलिए— क्योंकि घर छोड़ने वालों को आख़िरी बार वही छूती है। और फिर उम्र भर उनकी आहट सँभालकर रखती है।
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