गणपति : आरंभ के देव, अंतर्मन के प्रकाश
by Divyanshcbsbhatnagar
हर युग की पहली प्रार्थना में,
हर स्वप्न की पहली धड़कन में,
हर शुभ संकल्प की पहली साँस में
तुम ही तो बसते हो,
हे गजानन!
तुम केवल देव नहीं,
मानव चेतना के प्रथम आलोक हो।
जब मन संशयों के अंधकार में भटकता है,
तब तुम्हारा स्मरण
आशा का प्रथम दीप बनकर जल उठता है।
तुम्हारा मस्तक
बुद्धि के विराट आकाश का प्रतीक है,
जहाँ विचार सीमाओं में नहीं बंधते।
तुम्हारे विशाल कान
हर मौन प्रार्थना को सुन लेते हैं,
उन आहों को भी,
जो शब्दों में ढल नहीं पातीं।
तुम्हारी छोटी, एकाग्र आँखें
सिखाती हैं कि
सफलता शोर में नहीं,
एकाग्रता की निस्तब्धता में जन्म लेती है।
तुम्हारी सूँड बताती है—
जो वृक्ष उखाड़ सकती है,
वही एक नन्हे पुष्प को भी
कोमलता से उठा सकती है।
यही तो शक्ति का सबसे सुंदर स्वरूप है।
हे लंबोदर!
तुम्हारा विशाल उदर
जीवन के हर अनुभव का भंडार है।
अपमान हो या सम्मान,
हार हो या विजय,
कटुता हो या मधुरता
सबको धारण कर भी
मुस्कुराते रहना ही
जीवन की सर्वोच्च साधना है।
तुम्हारा वाहन, वह छोटा-सा मूषक,
मानव इच्छाओं का प्रतीक है।
जो अनियंत्रित हो जाएँ
तो जीवन को भटका दें,
और यदि विवेक के अधीन हों,
तो सफलता की ओर ले चलें।
यही तुम्हारी मौन शिक्षा है।
गणेश चतुर्थी केवल उत्सव नहीं,
यह आत्मा का नवजागरण है।
यह मिट्टी की प्रतिमा में
दिव्यता खोजने का नहीं,
अपने भीतर सोई दिव्यता को
जगाने का पर्व है।
जब घर-घर आरती गूँजती है,
जब दीपक की लौ
अंधकार को चुनौती देती है,
जब बच्चों की हँसी
मोदकों की मिठास से घुल जाती है,
तब लगता है
ईश्वर मंदिरों में नहीं,
मानव हृदयों में उतर आए हैं।
हे विघ्नहर्ता!
हमारे जीवन से केवल बाधाएँ ही मत हटाना,
उन भय, संदेह और अहंकार को भी हर लेना
जो हमें स्वयं से दूर कर देते हैं।
ऐसी बुद्धि देना
जो ज्ञान को विनम्रता में बदल दे,
ऐसा साहस देना
जो सत्य के लिए अडिग रहे,
ऐसी करुणा देना
जो हर जीव में तुम्हारा ही स्वरूप देख सके।
यदि कलम मिले,
तो वह समाज के घावों पर मरहम लिखे।
यदि वाणी मिले,
तो वह विभाजन नहीं, संवाद रचे।
यदि सफलता मिले,
तो उसमें सेवा का भाव हो।
यदि संघर्ष मिले,
तो उसमें धैर्य का प्रकाश हो।
और जब विसर्जन का क्षण आए,
तो जल में केवल प्रतिमा ही नहीं,
हमारे भीतर का लोभ, क्रोध, ईर्ष्या,
अहंकार और द्वेष भी बह जाए।
पीछे रह जाए
एक निर्मल मन,
एक जागृत चेतना,
और एक ऐसा जीवन
जिसका प्रत्येक कर्म
तुम्हारी आराधना बन जाए।
हे प्रथम पूज्य,
तुम्हारा आगमन केवल कैलेंडर की एक तिथि नहीं,
यह विश्वास का पुनर्जन्म है।
तुम्हारी मुस्कान केवल मूर्ति का सौंदर्य नहीं,
यह मानवता की सबसे सुंदर आशा है।
जब तक सत्य का सूर्य उदित होता रहेगा,
जब तक श्रद्धा का दीप जलता रहेगा,
जब तक मनुष्य अपने भीतर प्रकाश खोजता रहेगा,
तब तक हर आरंभ में,
हर प्रार्थना में,
हर सफलता में
तुम्हारा ही नाम गूँजता रहेगा।
गणपति बप्पा मोरया!
मंगलमूर्ति मोरया!
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