"माँ, मैं कारगिल से लौट नहीं पाऊँगा"
by Divyanshcbsbhatnagar
"माँ."
अगर इस बार लौटकर न आऊँ,
तो मेरी राहों में दीप मत जलाना।
मेरे कमरे की खिड़की खुली रखना,
पर मुझे पुकारकर कभी मत रुलाना।
मैंने वादा किया था,
तेरे हाथ की रोटी फिर खाऊँगा।
पर माँ...
इस बार शायद तिरंगे में लिपटकर ही आऊँगा।
जब दुश्मन की गोलियाँ बरस रही थीं,
तब तेरी दुआएँ मेरी ढाल बनी थीं।
हर साँस में तेरा नाम था,
हर धड़कन में भारत माँ बसी थी।
बहन से कहना,
इस बार राखी मेरी कलाई पर नहीं बँधेगी।
पर उसके भाई की वीरता,
हर तिरंगे की शान में ज़रूर दिखेगी।
पिता से कहना,
उनका सिर कभी झुकने न पाए।
जिस बेटे को उन्होंने संस्कार दिए,
वह आख़िरी साँस तक वतन निभाए।
मेरी छोटी-सी बेटी अगर पूछे,
"पापा कब आएँगे?"
तो उसे आसमान का सबसे चमकता तारा दिखाकर कहना
"बेटा... तुम्हारे पापा अब वहीं मुस्कुराएँगे।"
मेरी पत्नी के आँचल से कहना,
अब आँसू नहीं, गर्व बहना चाहिए।
उसका सुहाग भले अमर हो गया,
पर भारत का मस्तक ऊँचा रहना चाहिए।
मैं मरा नहीं हूँ माँ...
बस मिट्टी में समा गया हूँ।
हर पर्वत, हर सीमा, हर तिरंगे की लहर में,
मैं फिर से जन्म ले चुका हूँ।
जब भी कोई बच्चा
पूरे मन से "जय हिंद" बोलेगा,
समझ लेना...
तेरा बेटा फिर मुस्कुराएगा।
कारगिल की चोटियाँ आज भी गवाही देती हैं
वीर कभी मरते नहीं,
वे इतिहास नहीं,
राष्ट्र की धड़कन बन जाते हैं।
आओ, इस कारगिल विजय दिवस पर
केवल मोमबत्तियाँ न जलाएँ,
बल्कि ऐसा भारत बनाएँ
जिस पर हर शहीद की आत्मा गर्व कर सके।
उन अमर वीरों को अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि,
जिन्होंने अपने आज को हमारे कल के लिए समर्पित कर दिया।
जय हिंद।
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