एक कहानी यह भी (Ek Kahani Yah Bhi) by Mannu Bhandari: सार, प्रश्न-उत्तर, कक्षा 10 क्षितिज
Quick answer: एक कहानी यह भी (Ek Kahani Yah Bhi) मन्नू भंडारी का आत्मकथ्य, कक्षा 10 क्षितिज भाग 2: पिता, शीला अग्रवाल और 1946-47 के आंदोलन का पूरा सार, विषय और परीक्षा के प्रश्न-उत्तर।
अजमेर के ब्रह्मपुरी मोहल्ले की एक लड़की कॉलेज की हड़ताल में भाषण दे रही है, और घर पर उसका पिता तय नहीं कर पा रहा कि गर्व करे या डरे। मन्नू भंडारी का यह आत्मकथ्य, क्षितिज भाग 2 में संकलित, उसी दुविधा के बीच एक लेखिका के बनने की कथा है।
पाठ का सार
लेखिका का जन्म मध्य प्रदेश के भानपुरा में हुआ, पर यादें अजमेर से शुरू होती हैं, जहाँ पिता शब्दकोश बनाने में डूबे थे। इंदौर की समृद्धि के बाद अजमेर की तंगी ने पिता को क्रोधी और शंकालु बना दिया। लेखिका काली और दुबली थी, गोरी बड़ी बहन सुशीला से तुलना ने उसमें हीनता भर दी।
दसवीं के बाद कॉलेज में हिंदी की प्राध्यापिका शीला अग्रवाल ने उन्हें साहित्य और देश की स्थिति से जोड़ा। 1946-47 के दिनों में लेखिका जुलूसों, हड़तालों और भाषणों में आगे रहीं। पिता चाहते थे कि वे घर में बैठकर देश की बातें समझें, सड़क पर न निकलें; वे नाराज़ हुए। एक दिन प्रिंसिपल ने पिता को बुलाया, पर उन्होंने लेखिका के प्रभाव की प्रशंसा की, और पिता का क्रोध गर्व में बदल गया। छात्राओं की एकता के अनुभव ने उन्हें आत्मविश्वास दिया।
पात्र
पिता विरोधाभासों से बने हैं: प्रगतिशील पर शंकालु, बेटियों की शिक्षा के पक्षधर पर उनकी सार्वजनिक भागीदारी से डरे हुए। माँ त्याग की मूर्ति हैं, जिनकी निष्क्रियता लेखिका को स्वीकार नहीं। शीला अग्रवाल मार्गदर्शक हैं, जो किताबों से सड़क तक ले जाती हैं।
विषय और संदेश
अपेक्षित व्याख्या: व्यक्तित्व-निर्माण में परिवार और शिक्षक की भूमिका, स्त्री की सार्वजनिक भागीदारी पर पितृसत्तात्मक दुविधा, रंग-भेद से जन्मी हीनता और उसका अतिक्रमण।
मेरी टिप्पणी: पाठ का सबसे ईमानदार क्षण पिता के प्रति लेखिका का दोहरा भाव है। वे पिता के भीतर की हीनता और क्रोध को समझती हैं, उन्हें दोष नहीं देतीं, पर माफ़ भी नहीं करतीं।
लेखक की शैली और शिल्प
मन्नू भंडारी विश्लेषण करती हुई याद करती हैं। हर प्रसंग के साथ वे बताती हैं कि उसने उनके व्यक्तित्व में क्या जोड़ा या घटाया। Writory की लघुकथा प्रतियोगिता में, जिसमें 13 वर्ष से ऊपर कोई भी किसी भाषा में लिख सकता है और सबको 100 में स्कोर मिलता है, यही आत्म-विश्लेषण चरित्र की गहराई के अंक दिलाता है।
परीक्षा के लिए
संक्षिप्त सामग्री:
What writers can take from this
- तीन प्रभाव (पिता, माँ, शीला अग्रवाल) का उत्तर तालिका की तरह अलग-अलग लिखें।
- पिता के अंतर्विरोध पर प्रश्न सबसे अधिक आता है; क्रोध और गर्व दोनों प्रसंग लिखें।
- 1946-47 का समय अवश्य लिखें, आंदोलन के प्रश्न में संदर्भ के अंक हैं।
- अपने आत्मकथ्य में हर घटना के बाद एक पंक्ति में लिखें कि उसने आपको क्या बनाया।
- अपने बड़ों को खलनायक या देवता न बनाएँ; उनके अंतर्विरोध दिखाएँ।
Try it yourself
अपनी किशोरावस्था की एक ऐसी घटना लिखिए जिसमें आपके किसी बड़े ने आपको एक ही काम के लिए पहले डाँटा और फिर गर्व किया। दोनों प्रतिक्रियाओं के बीच का कारण खुद खोजिए।
Questions
एक कहानी यह भी पाठ में शीला अग्रवाल कौन थीं?
वे अजमेर के कॉलेज में हिंदी की प्राध्यापिका थीं, जिन्होंने लेखिका को चुनकर साहित्य पढ़ना सिखाया और 1946-47 के आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी की प्रेरणा दी।
लेखिका के पिता का स्वभाव कैसा था?
वे विद्वान और उदार थे पर आर्थिक तंगी से क्रोधी और शंकालु हो गए थे; बेटी की जागरूकता चाहते थे पर उसकी सड़क पर भागीदारी से डरते थे।
इस पाठ की विधा क्या है?
यह आत्मकथ्य है, जिसमें लेखिका अपने व्यक्तित्व के निर्माण की प्रक्रिया को विश्लेषण के साथ याद करती हैं।
By the Writory editorial team, reviewed by working writers. Updated September 2026.
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