कफ़न (Kafan) by Premchand: सार, पात्र और विषय
Quick answer: प्रेमचंद की कफ़न (Kafan) का सार अंत सहित: घीसू, माधव, बुधिया के कफ़न के पाँच रुपये और मधुशाला। विषय, व्यंग्य, शिल्प और परीक्षा के प्रश्नोत्तर हिंदी में।
झोपड़े के भीतर एक युवती प्रसव में मर रही है और बाहर अलाव पर उसका पति और ससुर भुने आलू खा रहे हैं; कोई भीतर नहीं जाता क्योंकि उसे रात भर जागना पड़ेगा। प्रेमचंद ने कफ़न 1936 में पहले उर्दू में लिखी; अंग्रेज़ी में इसका The Shroud पृष्ठ अलग से है।
कहानी का सार, अंत सहित
घीसू और उसका बेटा माधव गाँव में एक बात के लिए मशहूर हैं: काम नहीं करते। इस रात माधव की पत्नी बुधिया, घर की इकलौती कमाने वाली, भीतर छटपटा रही है। दोनों बाहर आलू भूनते बैठे बीस साल पहले ठाकुर की बरात में खाई दावत याद करते हैं, और उस स्मृति में उतनी कोमलता है जितनी मरती स्त्री के लिए दोनों में मिलकर नहीं। सुबह बुधिया मर चुकी है।
अब पहली बार दोनों में उत्साह आता है। रोते-पीटते वे कफ़न के लिए चंदा माँगते हैं और पाँच रुपये जमा हो जाते हैं। बाज़ार में कपड़ा देखते हुए वे मधुशाला की ओर मुड़ जाते हैं: कफ़न लाश के साथ जल जाता है, जिसे जीते जी साड़ी नहीं मिली उसे कफ़न से क्या, और गाँव फिर देगा ही। वे शराब पीते हैं, पूरियाँ खाते हैं, और गाते-नाचते हुए मधुशाला के पास गिरकर बेसुध हो जाते हैं। कफ़न कभी नहीं खरीदा जाता।
पात्र
तीन पात्र, जिनमें एक कभी बोलती नहीं।
- घीसू: पिता, जिसका आलस्य लगभग दर्शन है: मेहनत और भूख का फल एक ही है।
- माधव: बेटा, पिता से कमज़ोर, उसी व्यवस्था का शिष्य जिसके पास सिद्धांत नहीं।
- बुधिया: कमाने वाली पत्नी, जो पर्दे के पीछे मर जाती है; उसे एक संवाद नहीं मिला, इसीलिए उसकी चुप्पी सबसे ऊँची आवाज़ है।
विषय और अर्थ
अपेक्षित उत्तर: घोर ग़रीबी से पैदा हुई संवेदनहीनता, वह समाज जो जीवित बुधिया को रोटी नहीं देता पर लाश लपेटने का चंदा तत्काल देता है, और जाति-शोषण। तीखी बात यह कि घीसू का तर्क विचलन नहीं, गाँव का ही तर्क है: समाज मृत्यु के अनुष्ठान पर खर्च करता है, जीवित पर नहीं। लज्जा यह कि उसका हिसाब सही है।
शिल्प: कैमरा झोपड़े के बाहर रहता है
प्रेमचंद हमें एक बार भी भीतर नहीं ले जाते; बुधिया की पीड़ा आवाज़ बनकर आती है और मृत्यु दो दृश्यों के बीच होती है, इसलिए पाठक वहीं बैठने को विवश है जहाँ दोनों आदमी बैठे हैं। अंत फ़ैसले से बचता है, न सज़ा, न सुधार। Writory की लघुकथा प्रतियोगिता के निर्णायक कथा-संरचना के अंक देते हुए ऐसे ही ढाँचे खोजते हैं जो निष्कर्ष खुद कह दें।
परीक्षा के लिए
व्यंग्य की परिभाषा याद रखें।
- शब्दार्थ: कफ़न (शव को लपेटने का कपड़ा), अलाव (जलती आग), महाजन (ऋण देने वाला), मधुशाला (शराबख़ाना), बैकुंठ (स्वर्ग), कर्मकांड (धार्मिक रीति)।
- चरित्र-चित्रण, घीसू: साठ वर्ष का चमार, जो जान चुका है कि मेहनत करने वालों की दशा उससे बेहतर नहीं, इसलिए काम न करना उसका चुना रास्ता है। वह वाचाल, तर्कशील और संवेदनहीन है; बहू की मृत्यु पर भी ध्यान भोजन पर रहता है। फिर भी उसका तर्क समाज की कर्मकांडी दानशीलता को नंगा कर देता है, इसलिए वह खलनायक नहीं, व्यवस्था का आईना है।
- प्रश्न: घीसू और माधव कफ़न क्यों नहीं खरीदते? उत्तर: कफ़न जल जाएगा, बुधिया को जीते जी कपड़ा नहीं मिला, और गाँव फिर चंदा देगा।
- प्रश्न: व्यंग्य किस पर है? उत्तर: उस समाज पर जो जीवित के लिए कुछ नहीं करता पर मृतक के अनुष्ठान का पैसा तत्काल देता है।
- प्रश्न: बुधिया की मृत्यु पर्दे के पीछे क्यों है? उत्तर: ताकि पाठक भी बाहर बैठा रहे और उदासीनता भयावह लगे।
- 100 शब्दों का सार: घीसू और माधव, बाप-बेटे, गाँव के प्रसिद्ध आलसी हैं। माधव की पत्नी बुधिया प्रसव में मर रही है और दोनों बाहर आलू भूनते हुए पुरानी दावत की बातें करते हैं। सुबह बुधिया मर जाती है। दोनों रोते हुए कफ़न के लिए चंदा माँगते हैं और पाँच रुपये जुटा लेते हैं। बाज़ार में कफ़न देखने के बहाने वे मधुशाला पहुँच जाते हैं, तर्क देते हैं कि कफ़न जल ही जाएगा, शराब और पूरियाँ खाते हैं, बचा भिखारी को देते हैं, गाते-नाचते हैं और नशे में गिर पड़ते हैं। कफ़न नहीं खरीदा जाता। कहानी ग़रीबी से मरी मनुष्यता और समाज के कर्मकांडी दान पर व्यंग्य है।
What writers can take from this
- परीक्षा में केंद्रीय व्यंग्य सटीक लिखें: कफ़न का पैसा भोज पर, और देने वाले फिर देंगे।
- बुधिया की पर्दे के पीछे मृत्यु को कमी नहीं, लेखक का चुना दृष्टिकोण बताइए।
- बीस साल पुरानी दावत को प्रतीक कहें: हर मानवीय भाव के मरने के बाद भी बची भूख।
- अपनी कहानी में सामग्री जितनी गर्म हो, कथन उतना ठंडा रखें; कफ़न कहीं आवाज़ ऊँची नहीं करती।
- अँधेरी कहानी को बिना सज़ा और बिना उद्धार समाप्त करने का अभ्यास करें।
Try it yourself
दो पात्र किसी आपात स्थिति के लिए जुटाए पैसे को किसी अक्षम्य चीज़ पर खर्च कर देते हैं। केवल वह बातचीत लिखिए जिसमें वे स्वयं को समझाते हैं, आपात स्थिति को पर्दे के पीछे रखिए, और कथावाचक को फ़ैसले का एक शब्द भी न दीजिए।
Questions
कफ़न कहानी का मूल संदेश क्या है?
घोर ग़रीबी और शोषण मनुष्य की संवेदना को कैसे मार देते हैं, और समाज मृतक के अनुष्ठान पर तो खर्च करता है पर जीवित की भूख पर नहीं।
कफ़न में घीसू और माधव अंत में क्या करते हैं?
वे कफ़न के पाँच रुपये मधुशाला में शराब और पूरियों पर खर्च करते हैं, गाते-नाचते हैं और नशे में वहीं गिर पड़ते हैं।
कफ़न कहानी कब और किस भाषा में लिखी गई?
1936 में, प्रेमचंद के अंतिम वर्ष में। उन्होंने इसे पहले उर्दू में लिखा और फिर हिंदी में प्रकाशित किया।
By the Writory editorial team, reviewed by working writers. Updated September 2026.
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