मियाँ नसीरुद्दीन (Miyan Nasiruddin) by Krishna Sobti: सार, प्रश्न-उत्तर, कक्षा 11 आरोह
Quick answer: मियाँ नसीरुद्दीन (Miyan Nasiruddin) कृष्णा सोबती का शब्दचित्र, कक्षा 11 आरोह भाग 1: छप्पन तरह की रोटियाँ बनाने वाले नानबाई की पूरी कथा, विषय, शैली और परीक्षा के प्रश्न-उत्तर।
जामा मस्जिद के पीछे मटिया महल की एक तंग दुकान में एक बूढ़ा नानबाई दावा करता है कि वह छप्पन तरह की रोटियाँ बना सकता है, और पूछने वाली लेखिका को हर सवाल का जवाब आधे वाक्य में देता है। कृष्णा सोबती का यह शब्दचित्र आरोह भाग 1 में संकलित है।
पाठ का सार
लेखिका दिल्ली के मटिया महल इलाके में गढ़ैया मुहल्ले की एक पुरानी दुकान पर पहुँचती हैं, जहाँ मियाँ नसीरुद्दीन तंदूर के पास बैठे हैं। वे रोटियों के उस्ताद हैं और गर्व से कहते हैं कि छप्पन तरह की रोटियाँ बनाना जानते हैं। उनके जवाब नपे-तुले और तंज भरे हैं। यह हुनर उन्हें वालिद मियाँ बरकत शाही और दादा मियाँ कल्लन से मिला।
बातचीत में वे बादशाह के बावर्चीखाने से अपने ख़ानदान का रिश्ता बताते हैं, पर कौन बादशाह, यह नहीं बताते। वे एक किस्सा सुनाते हैं कि किसी बादशाह ने ऐसी रोटी माँगी जो न तंदूर में पके न तवे पर, और उनके पुरखे ने वह बना दी। अंत में वे कहते हैं कि अब कद्रदान नहीं रहे, लोगों को ज़ल्दी है, और यह फ़न उनके साथ ही चला जाएगा।
प्रमुख व्यक्ति
मियाँ नसीरुद्दीन कारीगरी के गर्व और पेशे के गिरते दौर की उदासी से बने पात्र हैं, जो ख़ानदानी हुनर को इज़्ज़त मानते हैं। लेखिका जिज्ञासु पत्रकार-जैसी वक्ता हैं, जिनकी असफल कोशिशें ही पात्र को खोलती हैं।
विषय और संदेश
अपेक्षित व्याख्या: परंपरागत कारीगरी का सम्मान, बदलते समय में कलाओं का लोप, और श्रम को कला मानने की दृष्टि।
मेरी टिप्पणी: पाठ की चाल यह है कि नसीरुद्दीन जितना छिपाते हैं उतना ही खुलते हैं। बादशाह का नाम न बताना, मज़दूरी का सवाल टालना, यह सब उनके गर्व की परत है, और उसके नीचे यह डर कि कोई उनके फ़न को झूठ न समझ ले।
लेखक की शैली और शिल्प
कृष्णा सोबती संवाद से चित्र बनाती हैं। उर्दू-हिंदी की मिली-जुली ज़बान, दिल्ली की गली का लहजा, और सवाल-जवाब की लय, यही तीन चीज़ें पूरा पाठ चलाती हैं। वर्णन बहुत कम है, पर तंदूर, आटे की लोई और दुकान का माहौल संवाद के बीच से झलकता है।
परीक्षा के लिए
संक्षिप्त सामग्री:
- शब्दार्थ: नानबाई = रोटियाँ बनाकर बेचने वाला; बावर्चीखाना = रसोई; कद्रदान = हुनर की परख रखने वाला; शागिर्द = चेला; फ़न = कला; तंज = कटाक्ष; वालिद = पिता।
- चरित्र-चित्रण (मियाँ नसीरुद्दीन): नसीरुद्दीन दिल्ली के पुराने नानबाई हैं, जो छप्पन तरह की रोटियाँ बनाने का दावा करते हैं। हुनर उन्हें पिता और दादा से मिला है, इसलिए वे इसे ख़ानदानी इज़्ज़त मानते हैं। वे कम बोलते हैं, तंज करते हैं और असुविधाजनक सवाल टाल देते हैं। बादशाह के बावर्चीखाने से रिश्ता जोड़कर गर्व दिखाते हैं। कद्रदानों के न रहने की उदासी उनके गुरूर के नीचे छिपी है।
- प्रश्न: मियाँ नसीरुद्दीन ने अपना हुनर किससे सीखा? उत्तर: अपने पिता मियाँ बरकत शाही से, जो प्रसिद्ध नानबाई थे; उनके दादा मियाँ कल्लन भी इसी पेशे में थे।
- प्रश्न: वे लेखिका के सवालों से क्यों झुँझलाते हैं? उत्तर: उन्हें लगता है कि सवाल पूछने वाले हुनर की कद्र नहीं जानते, और अपनी कारीगरी को अख़बार की ख़बर बनाना उन्हें पसंद नहीं।
- प्रश्न: बादशाह वाले किस्से का क्या महत्व है? उत्तर: यह उनके ख़ानदानी गर्व को दिखाता है; साथ ही बादशाह का नाम न बताना उनके रहस्यमय और आत्मरक्षक स्वभाव का संकेत है।
- सौ शब्दों में सार: लेखिका दिल्ली के मटिया महल में मियाँ नसीरुद्दीन की नानबाई की दुकान पर पहुँचती हैं। वे छप्पन तरह की रोटियाँ बनाने का दावा करते हैं और हर सवाल का छोटा, तंज भरा जवाब देते हैं। यह हुनर उन्हें पिता मियाँ बरकत शाही और दादा मियाँ कल्लन से मिला है। वे बादशाह के बावर्चीखाने से अपने पुरखों का रिश्ता बताते हैं और उस रोटी का किस्सा सुनाते हैं जो न तंदूर में पकी न तवे पर, पर बादशाह का नाम नहीं बताते। शागिर्दों और मज़दूरी के सवाल टाल देते हैं। अंत में कहते हैं कि अब कद्रदान नहीं रहे और यह फ़न उनके साथ चला जाएगा।
What writers can take from this
- छप्पन रोटियाँ, बरकत शाही, कल्लन, मटिया महल: चार तथ्य वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में आते हैं।
- 'शब्दचित्र' विधा की परिभाषा उत्तर में लिखें: संवाद और ब्योरों से किसी व्यक्ति का चित्र।
- उनके गर्व और उदासी दोनों का उल्लेख करें, केवल हुनर की बात न लिखें।
- अपनी कहानी में पात्र को उसकी बोली से खड़ा करें; बताएँ नहीं कि वह कैसा है।
- जो पात्र सवाल टालता है, उसे टालने दें; टालना भी चरित्र है।
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किसी पुराने कारीगर से एक काल्पनिक साक्षात्कार लिखिए जिसमें वह ज़्यादातर सवालों के जवाब न दे। उसकी चुप्पियों और तंज से पाठक तक उसका पूरा जीवन पहुँच जाए।
Questions
मियाँ नसीरुद्दीन पाठ किस विधा का है?
यह शब्दचित्र (व्यक्तिचित्र) है, जिसमें कृष्णा सोबती संवाद और ब्योरों से दिल्ली के एक नानबाई का व्यक्तित्व उभारती हैं।
मियाँ नसीरुद्दीन कितनी तरह की रोटियाँ बनाते थे?
वे छप्पन तरह की रोटियाँ बनाने का दावा करते थे, जो उन्हें ख़ानदानी हुनर के रूप में पिता और दादा से मिला था।
पाठ का मुख्य संदेश क्या है?
परंपरागत कारीगरी सम्मान की चीज़ है, पर बदलते समय में कद्रदान न रहने से ऐसे हुनर लुप्त हो रहे हैं।
By the Writory editorial team, reviewed by working writers. Updated September 2026.
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