नौबतखाने में इबादत (Naubatkhane Mein Ibadat) by Yatindra Mishra: सार, प्रश्न-उत्तर, कक्षा 10 क्षितिज
Quick answer: नौबतखाने में इबादत (Naubatkhane Mein Ibadat) यतींद्र मिश्र का व्यक्तिचित्र, कक्षा 10 क्षितिज भाग 2: बिस्मिल्ला ख़ाँ का जीवन, काशी और शहनाई, पूरा सार और प्रश्न-उत्तर।
काशी के बालाजी मंदिर की ड्योढ़ी पर भोर की शहनाई बज रही है और बजाने वाला एक मुसलमान बच्चा है, जो बड़ा होकर भारत रत्न पाएगा। यतींद्र मिश्र का यह व्यक्तिचित्र, क्षितिज भाग 2 में संकलित, उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ को उनके नौबतखाने से देखता है।
पाठ का सार
बिस्मिल्ला ख़ाँ का जन्म बिहार के डुमराँव में हुआ, बचपन का नाम अमीरुद्दीन था। छह वर्ष की आयु में वे काशी के ननिहाल आए, जहाँ मामा अलीबख़्श और सादिक हुसैन बालाजी मंदिर में शहनाई बजाते थे। छोटा अमीरुद्दीन उनके साथ नौबतखाने में बैठकर रियाज़ करता। रसूलनबाई और बतूलनबाई के गीतों से उसमें संगीत की समझ आई। शहनाई की रीड डुमराँव की नरकट से बनती है।
ख़ाँ साहब को कुलसुम हलवाइन की कचौड़ी की कड़कड़ाहट में संगीत सुनाई देता था। पाँचों वक्त की नमाज़ के साथ वे बालाजी और गंगा-मैया दोनों को अपना मानते थे। भारत रत्न मिलने के बाद भी वे फटी लुंगी में रहते और कहते कि फटी तहमद तो सिल जाएगी, पर सुर तो ऊपर से ही उतरता है। काशी छोड़ने से उन्होंने मना कर दिया। लेखक अंत में कहते हैं कि अस्सी बरस से शहनाई और काशी उनके लिए एक ही इबादत हैं।
प्रमुख व्यक्ति
बिस्मिल्ला ख़ाँ सादगी, साधना और गंगा-जमुनी संस्कृति के प्रतीक हैं, जिन्हें सुर ईश्वर की देन लगता है। मामा अलीबख़्श उनके गुरु हैं। रसूलनबाई और बतूलनबाई गायिकाएँ हैं जिनकी ठुमरी ने बचपन के कान खोले।
विषय और संदेश
अपेक्षित व्याख्या: कला धर्म से ऊपर है, सच्चा कलाकार जीवन भर सीखने वाला रहता है, और काशी की साझी संस्कृति।
मेरी टिप्पणी: पाठ का सबसे मूल्यवान वाक्य ख़ाँ साहब की वह प्रार्थना है कि उन्हें सुर मिले, बाकी सब चल जाएगा। भारत रत्न पाकर भी सुर की भीख माँगना यह बताता है कि कलाकार के लिए पुरस्कार मंज़िल नहीं, सुर है।
लेखक की शैली और शिल्प
यतींद्र मिश्र स्वयं संगीत के जानकार हैं, इसलिए शहनाई, रीड, नौबतखाने जैसे शब्द सटीक आते हैं। वे घटनाओं को कालक्रम से नहीं, प्रसंग से जोड़ते हैं: कचौड़ी, सिनेमा, नमाज़, लुंगी, हर प्रसंग एक गुण दिखाता है। भाषा में उर्दू और हिंदी की मिली-जुली मिठास है, जो विषय के अनुरूप है।
परीक्षा के लिए
संक्षिप्त सामग्री:
- शब्दार्थ: नौबतखाना = प्रवेश-द्वार के ऊपर मंगलध्वनि बजाने का स्थान; इबादत = उपासना; रियाज़ = अभ्यास; रीड = नरकट से बनी पत्ती जिससे शहनाई बजती है; तहमद = लुंगी; शहनाई = फूँक से बजने वाला मंगल वाद्य; अदब = शिष्टता।
- चरित्र-चित्रण (बिस्मिल्ला ख़ाँ): ख़ाँ साहब बचपन से नौबतखाने में साधना करने वाले शहनाई-वादक हैं। वे नमाज़ी हैं और बालाजी तथा गंगा को भी अपना मानते हैं, यानी उनकी आस्था में बँटवारा नहीं। भारत रत्न के बाद भी सादगी में रहते हैं और सुर को ऊपर की देन कहते हैं। काशी छोड़ना उन्हें स्वीकार नहीं। वे कला को इबादत और जीवन को अभ्यास मानने वाले सच्चे साधक हैं।
- प्रश्न: शहनाई और डुमराँव का क्या संबंध है? उत्तर: शहनाई की रीड डुमराँव की नरकट से बनती है, और ख़ाँ साहब का जन्म भी वहीं हुआ।
- प्रश्न: ख़ाँ साहब काशी क्यों नहीं छोड़ना चाहते थे? उत्तर: उनके लिए गंगा, बाबा विश्वनाथ, बालाजी और वहाँ के संगीत का माहौल जीवन का हिस्सा थे, जिन्हें कहीं और नहीं पाया जा सकता।
- प्रश्न: फटी तहमद वाले प्रसंग से क्या पता चलता है? उत्तर: सम्मान पाकर भी वे सादगी से रहे और मानते थे कि कपड़ा सिल सकता है, सुर ऊपर से ही मिलता है।
- सौ शब्दों में सार: बिस्मिल्ला ख़ाँ डुमराँव में जन्मे और छह वर्ष की आयु में काशी आए, जहाँ मामा अलीबख़्श बालाजी मंदिर में शहनाई बजाते थे। बालक अमीरुद्दीन नौबतखाने में रियाज़ करता और रसूलनबाई-बतूलनबाई के गीतों से सुर सीखता। शहनाई की रीड डुमराँव की नरकट से बनती है। उन्हें कुलसुम की कचौड़ी की कड़कड़ाहट और सुलोचना की फ़िल्मों का शौक था। वे नमाज़ी होते हुए बालाजी और गंगा को भी अपना मानते थे। भारत रत्न पाकर भी फटी लुंगी में रहे और सुर को ईश्वर की देन कहा। काशी छोड़ने से मना कर दिया। अस्सी बरस से शहनाई उनकी इबादत है।
What writers can take from this
- डुमराँव, काशी, बालाजी मंदिर, नौबतखाना: चार स्थान-नाम उत्तर में ज़रूर आएँ।
- गंगा-जमुनी संस्कृति के प्रश्न में नमाज़ और बालाजी दोनों प्रसंग साथ लिखें।
- सादगी के प्रमाण में फटी तहमद और सुर की प्रार्थना दोनों उदाहरण दें।
- व्यक्तिचित्र लिखते समय प्रसंगों को कालक्रम की जगह गुणों के अनुसार जोड़ें।
- विषय की भाषा अपनाएँ; संगीत पर लिखते समय वाद्य के सही शब्द जानें।
Try it yourself
किसी कलाकार या कारीगर का व्यक्तिचित्र लिखिए जिसकी साधना का स्थान कोई साधारण जगह हो, जैसे दुकान की सीढ़ी या मंदिर की ड्योढ़ी। उसकी एक खाने-पीने की आदत ज़रूर रखें।
Questions
नौबतखाने में इबादत पाठ किस पर आधारित है?
यह शहनाई-वादक उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ पर व्यक्तिचित्र है, जो डुमराँव में जन्मे, काशी के बालाजी मंदिर के नौबतखाने में साधना की, भारत रत्न पाए और जीवन भर काशी में रहे।
शीर्षक 'नौबतखाने में इबादत' का क्या अर्थ है?
नौबतखाना मंदिर की ड्योढ़ी पर शहनाई बजाने की जगह है; ख़ाँ साहब के लिए वहाँ शहनाई बजाना ही उपासना थी, इसलिए संगीत और इबादत एक हो गए।
बिस्मिल्ला ख़ाँ का बचपन का नाम क्या था?
अमीरुद्दीन; वे छह वर्ष की आयु में डुमराँव से काशी अपने ननिहाल आए।
By the Writory editorial team, reviewed by working writers. Updated September 2026.
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