प्रेमचंद के फटे जूते (Premchand Ke Phate Joote) by Harishankar Parsai: सार, प्रश्न-उत्तर, कक्षा 9 क्षितिज
Quick answer: प्रेमचंद के फटे जूते (Premchand Ke Phate Joote) हरिशंकर परसाई का व्यंग्य, कक्षा 9 क्षितिज भाग 1: पूरा सार, फटे जूते का प्रतीक, विषय, शैली और परीक्षा के प्रश्न-उत्तर।
एक पुरानी तस्वीर में हिंदी का सबसे बड़ा कथाकार पत्नी के साथ खड़ा है, और उसके बाएँ जूते में छेद से अँगुली बाहर झाँक रही है। हरिशंकर परसाई इस एक अँगुली से पूरा व्यंग्य खड़ा करते हैं, जो क्षितिज भाग 1 में पढ़ाया जाता है।
पाठ का सार
लेखक प्रेमचंद का एक फ़ोटो देख रहे हैं: सिर पर टोपी, मोटे कपड़े का कुरता-धोती, और कैनवस के जूते जिनके बंद बेतरतीब बँधे हैं। दाहिना जूता ठीक है, बाएँ में बड़ा छेद है जिससे अँगुली दिखती है। वे प्रेमचंद के चेहरे की अधूरी मुस्कान को पढ़ते हैं और लगता है कि वह मुस्कान उनकी अपनी दुनिया पर व्यंग्य है, जहाँ टोपी आठ आने में और जूता पाँच रुपये में मिलता है, फिर भी टोपी जूते के आगे झुकती रहती है।
आगे लेखक कल्पना करते हैं कि प्रेमचंद का जूता किसी टीले को ठोकर मारते-मारते फटा है, वे बाधाओं को बगल से काटकर नहीं निकले, सीधे टकराए। कुंभनदास का प्रसंग आता है, जो फतेहपुर सीकरी जाकर जूता घिसने का पश्चाताप करते थे। पाठ इस बोध पर बंद होता है कि प्रेमचंद की अँगुली पाठक की ओर संकेत है और उनकी मुस्कान हम पर तीखा व्यंग्य।
प्रमुख व्यक्ति
प्रेमचंद यहाँ पात्र नहीं, प्रतीक हैं: अभाव में भी पर्दा न करने वाला लेखक, जो बाधा को ठोकर मारता है। परसाई स्वयं वक्ता हैं, फ़ोटो से संवाद करते हुए।
विषय और संदेश
परीक्षा में अपेक्षित व्याख्या: फटा जूता अभाव का नहीं, आत्मसम्मान का प्रतीक है; मुस्कान समाज की उलटी प्राथमिकताओं पर व्यंग्य है; टीले को ठोकर मारना सामाजिक बुराइयों से सीधे संघर्ष का रूपक है।
मेरी टिप्पणी: पाठ की असली धार परसाई की आत्म-आलोचना में है। वे बार-बार 'हम' कहते हैं, यानी जूता बचाकर चलने वालों में स्वयं को गिनते हैं। व्यंग्य दूसरों पर हो तो सस्ता होता है, अपने पर हो तो साहित्य।
लेखक की शैली और शिल्प
परसाई का शिल्प संवाद का है: वे फ़ोटो को 'तुम' कहकर पुकारते हैं और प्रश्न पूछते हैं, जिससे निबंध बातचीत बन जाता है। लघुकथाकारों के लिए सबक यह है कि एक ठोस वस्तु, जैसे फटा जूता, अमूर्त विचार को कहीं ज़्यादा दूर ले जाती है।
परीक्षा के लिए
संक्षिप्त सामग्री:
- शब्दार्थ: बेतरतीब = अव्यवस्थित; टीला = मिट्टी का ऊँचा ढेर; अभाव = कमी; पश्चाताप = अफ़सोस; व्यंग्य = कटाक्ष; ट्रेजडी = दुखांत; कुरता = ढीला ऊपरी वस्त्र।
- चरित्र-चित्रण (प्रेमचंद, जैसा परसाई देखते हैं): फ़ोटो में प्रेमचंद साधारण वेश में हैं, जूता फटा है पर मुद्रा में बेपरवाही और स्वाभिमान है। वे बाधाओं से बचकर नहीं, टकराकर चले, इसलिए जूता ऊपर से फटा और तला बचा रहा। उनकी अधूरी मुस्कान उस समाज पर व्यंग्य है जो सम्मान की टोपी सस्ते में और दिखावे का जूता महँगा बेचता है। वे अभाव को छिपाते नहीं, पहनकर चलते हैं।
- प्रश्न: जूते के ऊपर फटने और तला घिसने में लेखक क्या अंतर देखते हैं? उत्तर: तला उनका घिसता है जो बाधाओं से बचकर चलते हैं; ऊपर से जूता उनका फटता है जो टीले को सीधी ठोकर मारते हैं, जैसे प्रेमचंद।
- प्रश्न: टोपी और जूते की कीमत का प्रसंग क्या बताता है? उत्तर: टोपी सस्ती और जूता महँगा होते हुए भी टोपी झुकती है; समाज में सम्मान का मूल्य साधन के आगे गिर गया है।
- प्रश्न: कुंभनदास का प्रसंग क्यों जोड़ा गया? उत्तर: कुंभनदास को सीकरी दरबार जाने पर जूता घिसने का अफ़सोस हुआ; लेखक दिखाते हैं कि सच्चा रचनाकार सत्ता के लिए जूता नहीं घिसता।
- सौ शब्दों में सार: परसाई प्रेमचंद का एक फ़ोटो देखते हैं जिसमें उनके बाएँ जूते के छेद से अँगुली दिखती है। वे सोचते हैं कि इतने बड़े लेखक के पास फ़ोटो के लिए भी ठीक जूता नहीं था। उनकी अधूरी मुस्कान लेखक को समाज पर व्यंग्य लगती है, जहाँ सस्ती टोपी महँगे जूते के आगे झुकती है। लेखक कल्पना करते हैं कि यह जूता किसी टीले को ठोकर मारते-मारते फटा, क्योंकि प्रेमचंद बाधाओं से बचकर नहीं चले। जो बचकर चलते हैं उनका तला घिसता है। अंत में अँगुली पाठक की ओर संकेत बन जाती है।
What writers can take from this
- तीन प्रतीक याद रखें: फटा जूता (स्वाभिमान), टीला (सामाजिक बाधा), टोपी-जूता (सम्मान बनाम साधन)।
- मुस्कान को 'व्यंग्य' कहकर व्याख्या करें, 'खुशी' या 'दुख' लिखने से उत्तर कमज़ोर पड़ता है।
- कुंभनदास का नाम और सीकरी का संदर्भ प्रायः लघु-उत्तरीय प्रश्न में आता है।
- अपने निबंध में किसी एक तस्वीर या वस्तु से शुरू करें और उसे अंत तक न छोड़ें।
- व्यंग्य लिखते समय 'हम' का प्रयोग करें; स्वयं को शामिल करने से धार बढ़ती है, कड़वाहट नहीं।
Try it yourself
अपने किसी प्रिय लेखक या शिक्षक की एक पुरानी तस्वीर की कल्पना कीजिए, जिसमें कोई छोटा-सा दोष दिख रहा हो। उसी दोष से बातचीत करते हुए बताइए कि वह व्यक्ति कैसे जिया होगा।
Questions
प्रेमचंद के फटे जूते पाठ का मूल भाव क्या है?
फटा जूता प्रेमचंद के अभाव से अधिक उनके स्वाभिमान और बाधाओं से सीधे टकराने का प्रतीक है। परसाई इसके माध्यम से उस समाज पर व्यंग्य करते हैं जो साधन को सम्मान से ऊपर रखता है।
टीले को ठोकर मारने का क्या अर्थ है?
टीला सामाजिक बुराइयों और बाधाओं का रूपक है। प्रेमचंद ने उन्हें बगल से काटकर निकलने की जगह सीधे ठोकर मारी, इसलिए उनका जूता आगे से फटा।
यह पाठ किस विधा का है?
यह व्यंग्य-निबंध है, जिसमें लेखक एक तस्वीर से संवाद करते हुए सामाजिक विसंगतियों पर कटाक्ष करते हैं।
By the Writory editorial team, reviewed by working writers. Updated September 2026.
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