तुम कब जाओगे, अतिथि (Tum Kab Jaoge Atithi) by Sharad Joshi: सार, प्रश्न-उत्तर, कक्षा 9 स्पर्श
Quick answer: तुम कब जाओगे, अतिथि (Tum Kab Jaoge Atithi) शरद जोशी का व्यंग्य, कक्षा 9 स्पर्श भाग 1: चार दिन ठहरे मेहमान की पूरी कथा, विषय, शैली और परीक्षा के प्रश्न-उत्तर।
चौथे दिन भी अतिथि के कपड़े धोबी को दिए जा रहे हैं, और मेज़बान कैलेंडर की तारीखें गिनते हुए मन में पूछ रहा है कि यह देवता विदा कब होगा। शरद जोशी का यह व्यंग्य, स्पर्श भाग 1 में संकलित, 'अतिथि देवो भव' की परीक्षा लेता है।
पाठ का सार
अतिथि बिना सूचना आते हैं और लेखक उन्हें देवता की तरह ग्रहण करता है। पहले दिन शानदार भोजन, दूसरे दिन सिनेमा। तीसरे दिन जब अतिथि कपड़े धोबी को देने की बात करते हैं, लेखक समझ जाता है कि यह ठहराव लंबा है। भोजन की गुणवत्ता गिरती है, खिचड़ी तक बात आती है, बातचीत का स्टॉक खत्म हो चुका है और दोनों अख़बार के पीछे चुप बैठे रहते हैं।
चौथे दिन लेखक का धैर्य टूटने को है। वह याद करता है कि अतिथि तीसरे दिन के बाद बोझ हो जाता है और मन में 'गेट आउट' तक की धमकी सोचता है, पर सभ्यता उसे कहने नहीं देती। वह ईश्वर से प्रार्थना करता है कि अतिथि की आँखों में जाने की चमक दिखे। कहानी इसी प्रतीक्षा में समाप्त होती है; अतिथि अभी गया नहीं है।
पात्र
लेखक मध्यवर्गीय मेज़बान है, सभ्यता और संकोच में फँसा, जिसका बजट और धैर्य दोनों चार दिन में समाप्त हो जाते हैं। अतिथि निश्चिंत और असंवेदनशील है, मेज़बान की परेशानी उसे दिखती नहीं।
विषय और संदेश
अपेक्षित व्याख्या: अतिथि-सत्कार की परंपरा और आधुनिक मध्यवर्ग की सीमित आय के बीच टकराव; अतिथि का दायित्व कि वह मेज़बान की स्थिति समझे; और सभ्यता के आवरण में दबी असली भावनाएँ।
मेरी टिप्पणी: व्यंग्य का निशाना अतिथि नहीं, लेखक स्वयं है। वह जिस देवता का स्वागत करता है, उसे तीसरे दिन मन में गाली देता है, और यह दोमुँहापन ही हास्य पैदा करता है। पाठ हमें अतिथि पर नहीं, अपने ही बनावटी शिष्टाचार पर हँसाता है।
लेखक की शैली और शिल्प
शरद जोशी अतिशयोक्ति से हँसाते हैं, पर उसकी बुनियाद रोज़ के ब्योरे हैं: मेनू का उतार, धोबी की गठरी, अख़बार की ओट। वे अतिथि को 'तुम' कहकर पूरे पाठ को संबोधन बना देते हैं, इसलिए हर पंक्ति संवाद जैसी लगती है। व्यंग्य लिखने वालों के लिए सीख: छोटे ब्योरों को बढ़ाकर दिखाओ, चिल्लाओ नहीं।
परीक्षा के लिए
संक्षिप्त सामग्री:
What writers can take from this
- चार दिनों का क्रम (भोजन, सिनेमा, धोबी, खिचड़ी) उत्तर में सीधा ढाँचा देता है।
- व्यंग्य का निशाना अतिथि और मेज़बान दोनों हैं, केवल अतिथि को दोष देकर उत्तर न लिखें।
- 'अतिथि देवो भव' और 'गेट आउट' के विरोध पर व्याख्या-प्रश्न बनता है।
- व्यंग्य लिखते समय एक रोज़मर्रा का ब्योरा चुनें और उसे हर पैराग्राफ़ में थोड़ा बढ़ाते जाएँ।
- पूरे पाठ को किसी एक व्यक्ति के संबोधन में लिखने का प्रयोग करें, आवाज़ में जान आ जाती है।
Try it yourself
ऐसा व्यंग्य लिखिए जिसमें कोई शुभचिंतक आपके घर या जीवन में ज़रूरत से ज़्यादा ठहर जाता है। दिन-दर-दिन की गिनती रखिए और अंत उसके जाने से पहले ही कर दीजिए।
Questions
तुम कब जाओगे, अतिथि पाठ का सार क्या है?
एक अतिथि बिना सूचना आकर चार दिन ठहर जाता है। मेज़बान लेखक पहले उसे देवता की तरह स्वागत देता है, फिर बजट और धैर्य चुकने पर मन में उसके जाने की प्रार्थना करता है। पाठ अतिथि-सत्कार की परंपरा और मध्यवर्ग की सीमाओं के टकराव पर हल्का व्यंग्य है।
लेखक अतिथि को जाने के लिए सीधे क्यों नहीं कहता?
सभ्यता और शिष्टाचार उसे रोकते हैं; वह 'गेट आउट' तक मन में सोचता है पर परंपरा का सम्मान उसे चुप रखता है।
यह पाठ किस विधा का है?
यह हास्य-व्यंग्य निबंध है, जिसमें रोज़मर्रा के ब्योरों को बढ़ाकर मध्यवर्गीय जीवन पर कटाक्ष किया गया है।
By the Writory editorial team, reviewed by working writers. Updated September 2026.
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