चुनरी
by Madhu meel
आज जब अपनी सूखती हुई चुनरी को देखती हूं तो दिखाई देती है
छलकती हुई पांच बूँदें
पहली बूंद में छलक रहा है मेरा स्वाभिमान,
दूसरी बूंद में छलक रही है मेरी ममता,
तीसरी बूंद में छलक रहा है मेरा सपना,
चौथी बूंद में छलक रहा है मेरा प्यार,
और रहा पांचवी में छलक मेरा श्रृंगार!
इसके साथ ही छलक आती है मेरी आँखों में पानी की बूँद, जब होती है उजागर माँ की यादें, दशकों पहले ऐसे ही छलकती थी उनकी चुनरी, और कहती थी मैं देखो ना माँ तुम्हारी चुनरी पुरे आंगन को गीला कर रही है!
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