रात अकेले ही खड़ी है
by Jaykishan Singh
थोड़ी गुमशुम है थोड़ी हैरां है
शायद मिली नहीं है चन्दा से,
धुन में अपनी हुंकार भरी है
रात अकेले ही खड़ी है ।
होश नहीं है चन्दा को
वो खेल रहा घटाओं से,
कभी छिप जाता है घंटों तक
कभी बतियाता हवाओं से ।
भौं चढ़ा ली रात ने अपनी
बात ये चन्दा तक पहुंची है,
अब फूल सफेद चन्दा है लाया
देख उसे दिल वार पड़ी है
रात अकेले ही खड़ी है ।
बरसाते अधजल बादल हैं
गुर्राते हर पल बादल हैं,
गरजते हैं इतराने को
जल कितना ये दिखाने को ।
एक घटा बादल से लड़ी है
हाथ लिए अधजल खड़ी है,
कभी डर जाती है गरज से यूँ ही
कभी गले रात के आ पड़ी है;
रो रही टपकाए आँसू
अपने बात कहने को अडी है
रात अकेले ही खड़ी है ।
हवा को देखा मस्ती में
वो नाच रही थी तेज धूप में,
साँझ होने से पहले ही
जैसे नशा किये वो लेटी है;
कभी ले आती है झोंके पल में
कभी घंटों तक वो रोती है ।
देर रात तक डूबी गम में
होश आने पे आँख लड़ी है,
रात अकेले ही खड़ी है ।
Published on the Writory Wall.